यह मेरा पहला काव्यपाठ है
थोड़ी सी प्रशंसा
थोड़ा सा प्रोत्साहन चाहिए
थोड़ा सा शुभ शुभ बोल दो
मेरे लिए दो चार ताली बजा दो
कि मैं तुम्हारा जरखरीद गुलाम हो जाऊँगा मेरे स्रोताओं
मैं अपनी रीढ़ की हड्डी घर छोड़ आया हूँ
छोड़ आया हूँ घर अपने सारे शब्दों के अर्थ
सच को सच बखानने वाले शब्द
उनके रंगों के ऊपर कालिख पोत दी है मैंने
कि न आ सकें
दुःख दर्द अपमान पीड़ा देने
लेकिन यह चलेगा नहीं
कि एक दिन कवि की रीढ़ मजबूत हो जाएगी
सच को सच कहने की हिमाकत करने लगेगा कवि
भर जाएंगे शब्दों में अर्थ
वापस आ जाएंगे रंग
कि उधियाये छत्ते से
जैसे निकलती हैं मधुमक्खियाँ
निकलेंगे वैसे ही शब्द
और उनके डंक से
जिंदा हो जाएगा कवि।
थोड़ी सी प्रशंसा
थोड़ा सा प्रोत्साहन चाहिए
थोड़ा सा शुभ शुभ बोल दो
मेरे लिए दो चार ताली बजा दो
कि मैं तुम्हारा जरखरीद गुलाम हो जाऊँगा मेरे स्रोताओं
मैं अपनी रीढ़ की हड्डी घर छोड़ आया हूँ
छोड़ आया हूँ घर अपने सारे शब्दों के अर्थ
सच को सच बखानने वाले शब्द
उनके रंगों के ऊपर कालिख पोत दी है मैंने
कि न आ सकें
दुःख दर्द अपमान पीड़ा देने
लेकिन यह चलेगा नहीं
कि एक दिन कवि की रीढ़ मजबूत हो जाएगी
सच को सच कहने की हिमाकत करने लगेगा कवि
भर जाएंगे शब्दों में अर्थ
वापस आ जाएंगे रंग
कि उधियाये छत्ते से
जैसे निकलती हैं मधुमक्खियाँ
निकलेंगे वैसे ही शब्द
और उनके डंक से
जिंदा हो जाएगा कवि।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें