रविवार, 11 अगस्त 2013

अगर मिली जिंदगी
तो तुम्हें प्यार करूँगा
उतार दूँगा तुम्हारे सदियों के उधार
चुरा ले आऊँगा
तुम्हारे लिए
इन्द्र के बगीचे से पारिजात
कि अभी थोड़ा सा धीरज धरो
कि नगर में आये हैं तथागत
कर आऊँ उनका दर्शन
इस बार नहीं फँसूगा उनके मुखमण्डल की आभा में
तुषित स्वर्ग भी जाना नहीं है मुझे
नहीं पगलाऊँगा मुक्ति के पीछे

कि अभी शामिल होना है
निःशब्द जाते जुलूसों में मुझे
हारे हुए लोगों के
लाठी चार्ज से लौटे सूजी पीठ लिए
अपनी मछलियाँ अपने पान-फूल
अपनी नदी अपना पेड़ बचाने के विरोध में

शामिल होना है मुझे
अपने छोटे भाइयों के शवदाह में
वो खूबसूरत और बहादुर लोग
हमेशा की तरह इस बार भी मारे गये हैं
एनकाउंटर में
चोर उचक्के डाकू कहकर
सिर पर आकांक्षाओं की गठरी लादे
दमकती आत्माओं वाली
स्त्रियों के गोल के संग संग जाना है मुझे
प्रजातंत्र की रैली में
और शायद लौट आऊँ घर तक सकुशल
सरपट दौड़ाये जा रहे
शाही घोड़ों और पीतल जड़ी लाठियों से बचकर
बचना इसलिए है कि तुम्हें करना है प्यार
तुम्हारे लिए बचाए रखनी है पारिजात की खुशबू

थोड़ी सी बचाये रखनी है आग
बार बार मार खाकर लड़ते जाने की जिद
बचाये रखनी है
कि ऐसे ही छोटी छोटी लड़ाइयों में हारे हुए लोग
बदल देते हैं लड़ाई के तौर तरीके
बदल देते हैं सत्ता का व्याकरण
कि तब तक तुम बचाकर रखना धैर्य
मंै बचाए रखूँगा पारिजात की खुशबू

मंगलवार, 14 मई 2013

यह मेरा पहला काव्यपाठ है
थोड़ी सी प्रशंसा
थोड़ा सा प्रोत्साहन चाहिए
थोड़ा सा शुभ शुभ बोल दो
मेरे लिए दो चार ताली बजा दो
कि मैं तुम्हारा जरखरीद गुलाम हो जाऊँगा मेरे स्रोताओं
मैं अपनी रीढ़ की हड्डी घर छोड़ आया हूँ
छोड़ आया हूँ घर अपने सारे शब्दों के अर्थ
सच को सच बखानने वाले शब्द
उनके रंगों के ऊपर कालिख पोत दी है मैंने
कि न आ सकें
दुःख दर्द अपमान पीड़ा देने

लेकिन यह चलेगा नहीं
कि एक दिन कवि की रीढ़ मजबूत हो जाएगी
सच को सच कहने की हिमाकत करने लगेगा कवि
भर जाएंगे शब्दों में अर्थ


वापस आ जाएंगे रंग
कि उधियाये छत्ते से
जैसे निकलती हैं मधुमक्खियाँ
निकलेंगे वैसे ही शब्द
और उनके डंक से
जिंदा हो जाएगा कवि।